नीमच। देखने में आता है कि हर वर्ष अप्रैल , मई व जून के माह में जल की समस्या बड़ा विकराल रूप ले लेती है । इन दिनों तापमान/टेंपरेचर 50 डिग्री सेल्सियस को छूने लगा है , जो कि बहुत ही असह्य और संकट पूर्ण स्थिती है । यदि हमने उचित उपाय नहीं किए तो, तापमान/टेंपरेचर को ग्रीष्म ऋतु में 52/55 डिग्री होने में अधिक समय नहीं लगेगा। तब होने वाली समस्या का हम अनुमान लगा सकते हैं। कारण पर गौर किया जाए तो, 1.बढ़ती जनसंख्या का घनत्व/ दबाव तथा बढ़ता निर्माण , 2.पुरानी नदियों चाहे छोटी हो या बड़ी का संकड़ा होना। कुछ छोटी नदियां नाले के रूप में परिवर्तित हो गई हैं या लुप्त हो गई हैं। 3. पुराने कुएं ,बावड़ियों व तालाबों का रख रखाव, सफाई व संरक्षण नहीं होना। कुछ तो बंद भी कर दिए गए हैं। 4. वृक्षों की कटाई होना व उचित प्रकार के वृक्ष ,उचित संख्या में नहीं लगाना तथा उनका संरक्षण नहीं करना, 5. सड़क निर्माण के दौरान वृक्षों को उचित/चिन्हित स्थान पर स्थानांतरित नहीं करना, 6.वर्षा ऋतु के पानी का उचित दोहन/संकलन नहीं होना, 7.पानी का अत्यधिक खर्च। कहा गया है कि, रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती, मानस, चून।। नीमच नगर में वर्ष 2000 के पूर्व गोमाबाई हॉस्पिटल के पास, किलेश्वर महादेव के पास, महू रोड पर बालाजी मंदिर के पास व कुछ अन्य जगह भी नदी की सफाई व गहरीकरण किया गया था । शहर में बड़ी संख्या में विशेष कर नीम के वृक्ष लगाए गए थे। वृक्षों के संरक्षण हेतु ट्री गार्ड लगाए गए थे, तथा संरक्षण भी किया गया था। आज हम उचित संख्या में नीम के पेड़ नीमच में देख पा रहे हैं। गहरीकरण के बाद कुछ कॉलोनियों में जल का स्तर बढ़ा भी था । कुछ समय पहले इंदिरा नगर के तालाब का गहरीकरण व सौंदर्यीकरण किया गया, जिसका लाभ इंदिरा नगर वासियों को मिला है । इन रचनात्मक कार्यों के लिए उस समय के जिलाधीश, नगर पालिका अध्यक्ष /अधिकारी व सामाजिक संस्थाएं जिन्होंने इन रचनात्मक कार्यों को किया बधाई के पात्र हैं । लेकिन लंबे समय बाद पुनः ध्यान देने की आवश्यकता है। समस्या केवल कस्बे या शहर की नहीं है।समस्या पूरे प्रदेश व देश की है। समस्या निवारण के उपाय, 1.नए मकान में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम आवश्यक हो , 2.पुराने मकान में भी वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम हेतु प्रोत्साहन दिया जाए , 3.जहां भी पानी का लीकेज हो उसको विशेष रूप से ध्यान देकर बंद किया जाए, लीकेज से भी पानी का बहुत नुकसान होता है। 4.पानी के महत्व को समझने/समझाने के लिए पानी के मीटर लगाना व उचित खर्च व चार्ज लिया जा सकता है, 5.हम घर में भी छोटे छोटे पौधे लगाएं, 6.शहर में लगभग सभी कॉलोनी में साथ ही स्कूलों में, सरकारी कार्यालयों व सार्वजनिक स्थानों में बड़े बडे़ बगीचे हैं लेकिन इनमें वृक्ष बहुत कम है। ऐसी दशा में नीम, शीशम ,सागवान, अशोक, इमली ,बड़ व पीपल के वृक्ष अच्छी संख्या में लगाए जाएं व उनका संरक्षण किया जाए । बड़,पीपल के वृक्ष बगीचे के बीच में लगाएं जाएं जिससे उनकी जड़ों के फैलाव से अन्य घरों को नुकसान न हो। निश्चित रूप से शहर हरा भरा हो जायेगा। बगीचों में पाथवे को छोड़कर बाकी स्थान को खुला रखा जावे टाइल्स नहीं लगाई जावे ।जिससे वर्षा का पानी अंदर जमीन में पहुंचेगा व जलस्तर बढ़ेगा। साथ ही अधिक वृक्ष होने से वर्षा भी अधिक होगी । 7.आज भी हम पुराने कुएं,बावड़ी, तालाबों, नालों व नदियों को साफ करने व गहरा करने का प्रयास करें तो जून ,जुलाई माह में वर्षा के प्रारंभ के साथ ही पानी का अच्छा संकलन प्रारंभ हो जाएगा ।जो एक सुखद स्थिति होगी। कई धार्मिक स्थानों पर पुराने, पक्के किंतु कीमती व गहरे कुएं ,बावड़िया बने हुए हैं ,जो रख रखाव के अभाव में अनुपयोगी हो गए हैं। मई माह में उनकी सफाई करवा कर गहरीकरण करवाया जावे तो जून जुलाई माह में होने वाली वर्षा से शुद्ध जल प्रदाय का एक अच्छा स्रोत उपलब्ध रहेगा । इन पर ग्राम पंचायत ,परिषद, नगर पालिका ,नगर निगम एक विद्युत मोटर लगवा दे। जिससे पानी का उपयोग होता रहे व पानी शुद्ध व स्वच्छ भी रहे। नदियों, तालाबों की भी सफाई, चौड़ी करण व गहरीकरण आवश्यक है जो मई, जून में ही सम्भव है।छोटे-छोटे नए तालाब व छोटे डेम भी बनाए जावें, जिससे अंडरग्राउंड पानी का लेवल अच्छा होगा । यदि हम आज भी नहीं जागे तो स्थिति बिगड़ने में अधिक समय नहीं लगेगा। 8. वन भूमि में भी, शासन के वन विभाग के सहयोग से 1कि मीटर*1 कि मीटर या इसी प्रकार के क्षेत्रों को घेरकर, सघन वृक्ष या फलदार वृक्ष लगाए जाएं । इससे 5/7 वर्ष बाद हजारों की संख्या में वृक्ष उपलब्ध होंगे तथाआय का श्रोत भी बनेगा। वन्य प्राणियों को भी वृक्ष की छाया व पानी उपलब्ध होता रहेगा। कहा गया है कि, *का वर्षा जब फसल सुखाने।* नीमच में जलप्रदाय का सबसे बड़ा श्रोत जाजू सागर डेम है, लेकिन वर्षा की कमी ,जल की चोरी ,गर्मी में जल का अत्यधिक वाष्पी करण होने से पानी कम हो जाता है, व जलप्रदाय में कठिनाई आती है । गांधी सागर डेम से पानी लाने की वैकल्पिक व्यवस्था चल रही है। फिर भी यह आवश्यक है कि हर गांव,कस्बा व शहर पानी के मामले में आत्मनिर्भर बने। हम जानते हैं कि अल्प वृष्टि के जगह अधिक वृष्टि होने से नुकसान तो होता है,पर अधिक वर्षा होने से,हम और कृषक सभी प्रसन्न होते हैं, क्योंकि कृषक दूसरी फसल भी आराम से ले सकता है । 1.आज हम पानी को देखकर खर्च करें , वाहन आदि कम पानी से धोएं। 2.जहां आवश्यक लगे रीसाइक्लिंग भी करें , 3.पक्षियों व पशुओं के लिए भी पानी की व्यवस्था करें , 4.अपने घरों में भी यथासंभव छोटे-छोटे पौधे लगाए ।इससे आंखों को सुकून मिलेगा तथा दिन अच्छा निकलता है। कुछ वर्षों पूर्व कहा जाता था, मालव धरती गहन गंभीर। डग डग रोटी, पग पग नीर। हम यदि गंभीरता से जल, जमीन ,जंगल व जीवों पर ध्यान दें तो जीवन निश्चित रूप से सुधरेगा । हम मालव धरती के लिए लिखी गई पंक्तियों को चरितार्थ कर पाएंगे। इस कार्य में कहीं देर न हो जाए। द्वारा: विष्णु कुमार गोयल, नीमच। दि 28 अप्रैल 25 .